फैशन डिजाइनर अंजलि फौगाट का मानना है कि किसी भी सामाजिक मुद्दे पर जागरूकता फैलाने का सबसे प्रभावी तरीका लोगों को उससे जोड़ना है। जब लोग किसी मुद्दे को सिर्फ आंकड़ों के रूप में देखने के बजाय उससे जुड़ाव महसूस करते हैं, तो वे उसे बेहतर तरीके से समझ पाते हैं। अंजलि का यह विश्वास ‘गरबा बियॉन्ड बॉर्डर्स’ के अनुभव से और मजबूत हुआ, जहां संस्कृति, संगीत और सामुदायिक एकजुटता के साथ मानव तस्करी जैसे गंभीर मुद्दे पर जागरूकता फैलाने की कोशिश की गई।
आंकड़ों से आगे बढ़कर मुद्दे को समझना जरूरी
अंजलि फौगाट के अनुसार, जागरूकता अभियान का उद्देश्य सिर्फ लोगों तक जानकारी पहुंचाना नहीं, बल्कि उन्हें उस मुद्दे के प्रति संवेदनशील बनाना भी होना चाहिए। वह चाहती हैं कि ऐसे आयोजनों में शामिल होने वाले लोग जागरूकता के साथ जिज्ञासा, करुणा और सीखने की इच्छा लेकर लौटें।
इस बारे में उन्होंने कहा, “मैं उम्मीद करती हूं कि लोग सबसे पहले जागरूकता लेकर जाएं और फिर उनके भीतर जिज्ञासा, करुणा और सीखने की इच्छा पैदा हो। हम अक्सर मानव तस्करी से जुड़े आंकड़े सुनते हैं।”
उन्होंने आगे कहा कि जब इस विषय पर किसी सामुदायिक आयोजन में चर्चा होती है, तो लोगों को समझ आता है कि यह समस्या कहीं दूर किसी अनजान व्यक्ति के साथ होने वाली घटना भर नहीं है। यह एक गंभीर मानवीय मुद्दा है, जो समाज के लिए चिंता का विषय है।
गरबा के जरिए सामाजिक संदेश पहुंचाने की पहल
अंजलि के लिए ‘गरबा बियॉन्ड बॉर्डर्स’ सिर्फ संस्कृति, संगीत और उत्सव का मंच नहीं था, बल्कि सामाजिक जागरूकता फैलाने का एक अवसर भी था। उनका मानना है कि जब किसी गंभीर विषय को लोगों के रोजमर्रा के जीवन और सामुदायिक गतिविधियों से जोड़ा जाता है, तो वे उस पर सहजता से विचार कर पाते हैं।
उन्होंने कहा, “लोग संस्कृति, संगीत और समुदाय का जश्न मना रहे थे और साथ ही एक संदेश का हिस्सा भी बन रहे थे।”
अंजलि के मुताबिक, इस तरह के आयोजन लोगों को बिना किसी दबाव के किसी महत्वपूर्ण विषय को समझने और उस पर बातचीत करने का मौका देते हैं। उनके लिए जागरूकता ही रोकथाम की दिशा में पहला कदम है।
एक व्यक्ति से शुरू हो सकता है बदलाव
अंजलि फौगाट का मानना है कि जागरूकता का असर किसी एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहना चाहिए। अगर आयोजन में शामिल कोई एक व्यक्ति भी नई जानकारी लेकर जाता है और अपने परिवार या दोस्तों से उस पर बातचीत करता है, तो इसका प्रभाव आगे बढ़ सकता है।
उन्होंने इस प्रक्रिया को सकारात्मकता का ‘रिपल इफेक्ट’ यानी एक के बाद दूसरे व्यक्ति तक पहुंचने वाला प्रभाव बताया। उनके अनुसार, एक व्यक्ति जानकारी हासिल कर सकता है, दूसरा इस विषय पर शोध करने के लिए प्रेरित हो सकता है और कोई युवा शोषण के संकेतों को लेकर अधिक जागरूक बन सकता है।
अंजलि ने कहा, “एक व्यक्ति कुछ नया सीखता है और अपने परिवार से बात करता है। कोई दूसरा व्यक्ति इस विषय को लेकर जिज्ञासु होता है और इसके बारे में जानकारी जुटाने लगता है। कोई युवा शोषण के संकेतों को लेकर अधिक जागरूक हो जाता है। इस तरह बातचीत आगे बढ़ती है।”
जागरूकता की शुरुआत ही एक सार्थक कदम
अंजलि के लिए किसी जागरूकता अभियान की सफलता सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि कितने लोगों तक संदेश पहुंचा। उनके अनुसार, अगर कार्यक्रम के बाद कोई व्यक्ति मानव तस्करी की गंभीरता को समझने और इसके बारे में अधिक जानने की इच्छा रखता है, तो यह भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
उन्होंने कहा, “अगर कोई व्यक्ति कार्यक्रम से यह सोचकर लौटता है कि उसे पता ही नहीं था कि यह इतना गंभीर मुद्दा है और वह इसके बारे में और जानना चाहता है, तो कार्यक्रम पहले ही कुछ सार्थक हासिल कर चुका है।”
अंजलि फौगाट की यह पहल बताती है कि सांस्कृतिक आयोजनों के जरिए सामाजिक मुद्दों पर बातचीत को नई दिशा दी जा सकती है। गरबा जैसे सामुदायिक उत्सवों के माध्यम से लोगों को जोड़ना और उन्हें मानव तस्करी के प्रति जागरूक बनाना समाज में सकारात्मक बदलाव की शुरुआत हो सकता है।
