हक मूवी रिव्यू: यामी गौतम और इमरान हाशमी की धमाकेदार टक्कर, कोर्टरूम ड्रामा को मिली नई ऊंचाई
7 नवंबर 2025 को रिलीज़ हुई इमरान हाशमी और यामी गौतम स्टारर फिल्म हक अभी भी कई सिनेमाघरों में चल रही है। अगर आप इस वीकेंड कुछ गंभीर, विचारोत्तेजक और भावनात्मक रूप से दमदार सिनेमा देखने का मूड बना रहे हैं, तो यह फिल्म आपके लिए परफेक्ट हो सकती है। “हक” का मतलब है अधिकार – और यह फिल्म ठीक उसी हक की लड़ाई है जो एक आम औरत अपने सम्मान, गुज़ारे और अधिकार के लिए लड़ती है।
कहानी: 80-90 के दौर में एक सशक्त औरत की जंग

फिल्म की पृष्ठभूमि 1980-90 का भारत है, जब तलाक, मेहर और मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों पर देश में ज़ोरदार बहस चल रही थी। यामी गौतम ने शाजिया बानो का किरदार निभाया है – एक ऐसी मुस्लिम महिला जिसका पति अब्बास खान (इमरान हाशमी) उसे एक पल में तीन तलाक देकर छोड़ देता है, दूसरी शादी कर लेता है और धर्म के नाम पर अपने कुकर्मों को जायज़ ठहराता है।
शाजिया कोर्ट की शरण लेती है। उसकी लड़ाई सिर्फ़ पति से नहीं, बल्कि रूढ़िवादी समाज, पितृसत्ता और पुराने कानूनों से है। फिल्म बहुत संजीदगी से यह दिखाती है कि कैसे धर्म के नाम पर औरत के हक को कुचला जाता रहा है और कैसे एक औरत ख़ामोशी से नहीं, बल्कि कानून की भाषा में अपना हक मांगती है। कहानी में कोई अनावश्यक मसाला नहीं है – सब कुछ वास्तविक और ज़मीनी लगता है।
अभिनय: यामी और इमरान के करियर का बेस्ट परफॉर्मेंस

यामी गौतम इस फिल्म की आत्मा हैं। शाजिया बानो के किरदार में वो इतनी सच्ची और गहरी उतर गई हैं कि कोर्ट रूम के हर सीन में आप उनकी आंखों में दर्द, गुस्सा और हिम्मत एक साथ महसूस करेंगे। खास तौर पर वो सीन जहां वो जज के सामने अपनी बात रखती हैं – रोंगटे खड़े कर देने वाला है। यह अब तक की उनकी सबसे परिपक्व और प्रभावशाली परफॉर्मेंस है।
इमरान हाशमी ने सबको चौंकाया है। वो दोहरे रोल में हैं – एक तरफ़ क्रूर, स्वार्थी और धर्म का ढोंग करने वाला पति अब्बास खान, दूसरी तरफ़ ठंडे दिमाग वाला वकील। दोनों किरदारों में उन्होंने गज़ब की गहराई दिखाई है। सालों बाद इमरान का ऐसा सधा हुआ, संयमित और दमदार अभिनय देखकर अच्छा लगा। उनके संवादों में जो कशिश और वज़न है, वो फिल्म को और ऊंचाई पर ले जाता है।
निर्देशन और तकनीकी पहलू
सुपर्ण एस. वर्मा (जिन्हें आप द फैमिली मैन सीज़न-1 से जानते हैं) ने इस गंभीर विषय को बहुत सादगी और संवेदनशीलता से पेश किया है। फिल्म की रफ्तार थोड़ी धीमी ज़रूर है, लेकिन कोर्ट रूम के सीन इतने तीखे और तार्किक हैं कि आप बोर नहीं होते। बैकग्राउंड स्कोर माहौल को गहराई देता है, सिनेमाटोग्राफी शानदार है और संवाद इतने सटीक हैं कि कई लाइनें आप लंबे समय तक याद रखेंगे।
हां, एक-दो जगह फिल्म थोड़ी लंबी लगती है और कुछ सब-प्लॉट्स को और बेहतर तरीके से बुना जा सकता था, लेकिन कुल मिलाकर निर्देशन फिल्म के संदेश को कमज़ोर नहीं होने देता। संदेश बहुत साफ़ और ज़ोरदार है – “हक किसी का एहसान नहीं, हर इंसान का अधिकार है।”
देखें या स्किप करें?
अगर आपको पिंक, थप्पड़, आर्टिकल 15, नो वन्स किल्ड जेसिका या बदला जैसी फिल्में पसंद हैं, अगर आपको सशक्त महिला किरदार और सोशल-लीगल ड्रामा अच्छा लगता है, तो “हक” आपके लिए मस्ट वॉच है। यह फिल्म आपको सोचने पर मजबूर करेगी, भावुक करेगी और कई बार गुस्सा भी दिलाएगी।
लेकिन अगर आप इस वीकेंड सिर्फ़ मसाला, कॉमेडी या हल्की-फुल्की एंटरटेनमेंट चाहते हैं, तो शायद यह फिल्म आपके मूड से मैच न करे।