‘हुई गुम यादें’ में सुहासिनी का किरदार निभा रहीं अभिनेत्री ज्योति तिवारी का मानना है कि शांति का मतलब सिर्फ जिंदगी में किसी तरह के विवाद का न होना नहीं है। उनके लिए सच्ची शांति भीतर से आती है और इसका गहरा संबंध स्वीकार करने, दूसरों को समझने, धैर्य रखने और उन चीजों को छोड़ देने से है, जिन्हें हम नियंत्रित नहीं कर सकते।
शांति का उनके लिए क्या मतलब है, इस बारे में बात करते हुए ज्योति कहती हैं, “मेरे लिए शांति का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि कोई विवाद न हो। यह आपके भीतर मौजूद सुकून की भावना है। जब आपका मन शांत होता है, तो आपको हर बात पर प्रतिक्रिया देने, खुद को साबित करने या बेवजह की नकारात्मकता साथ लेकर चलने की जरूरत महसूस नहीं होती। मेरे लिए शांति का मतलब चीजों को स्वीकार करना, जिन चीजों पर हमारा नियंत्रण नहीं है उन्हें छोड़ देना और फिर भी सकारात्मक बने रहना है।”
ज्योति का मानना है कि रिश्तों को मजबूत बनाए रखने और मतभेदों को बढ़ने से रोकने के लिए समझ और सहानुभूति बेहद जरूरी है। वह कहती हैं, “मुझे नहीं लगता कि समझ और सहानुभूति के बिना लंबे समय तक शांति बनी रह सकती है। जरूरी नहीं कि हम एक-दूसरे की हर बात से सहमत हों, लेकिन कम से कम हमें यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि सामने वाला किस नजरिए से सोच रहा है। थोड़ी सी सहानुभूति हमारे बातचीत करने के तरीके को बदल सकती है और छोटी-छोटी असहमतियों को बड़े विवाद में बदलने से भी रोक सकती है।”
अभिनेत्री के मुताबिक शांत माहौल बनाने के लिए हमेशा बड़े कदम उठाने की जरूरत नहीं होती। दयालुता, धैर्य और हर बात पर तुरंत प्रतिक्रिया न देना भी काफी फर्क ला सकता है। ज्योति कहती हैं, “मुझे लगता है कि सिर्फ दयालु होना और हर बात पर तुरंत प्रतिक्रिया न देना भी काफी शांति ला सकता है। कई बार हम बिना सोचे-समझे जज करने, बहस करने या जवाब देने लगते हैं, जबकि हम बस थोड़ा रुककर सामने वाले की बात सुन सकते हैं। थोड़ा धैर्य और एक अच्छा शब्द भी किसी का दिन बेहतर बना सकता है।”
अलग-अलग विचारों, पृष्ठभूमि और पसंद के बावजूद लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने वाली चीजों पर बात करते हुए ज्योति कहती हैं कि इंसानी भावनाएं सभी को जोड़ती हैं। उनके मुताबिक, “मुझे लगता है कि लोगों को एक-दूसरे के करीब लाने वाली चीज यह याद रखना है कि हमारे बीच भले ही कई अंतर हों, लेकिन हमारी बुनियादी भावनाएं काफी हद तक एक जैसी हैं। हम सभी प्यार, सम्मान, सुरक्षा और खुशी चाहते हैं। हमारी सोच और पृष्ठभूमि अलग हो सकती है, लेकिन अगर हम लगातार अपने मतभेदों को सामने रखने के बजाय उन चीजों पर ध्यान दें जो हमें जोड़ती हैं, तो एक-दूसरे को समझना आसान हो सकता है।”
ज्योति का मानना है कि शांतिपूर्ण समाज बनाने की जिम्मेदारी सिर्फ संस्थाओं या सरकारों की नहीं, बल्कि हर व्यक्ति की भी है। वह कहती हैं, “मुझे लगता है कि इसकी शुरुआत दोनों स्तरों से होनी चाहिए। संस्थाओं और सरकारों की बड़ी जिम्मेदारी है, लेकिन हम एक-दूसरे के साथ हर दिन जिस तरह का व्यवहार करते हैं, उसमें भी व्यक्तियों और समुदायों की भूमिका होती है। बड़े स्तर पर बदलाव जरूरी है, लेकिन मेरा मानना है कि शांति हमारे अपने व्यवहार, हमारे घर और हमारे समुदाय से शुरू होती है।”
सुलह और आगे बढ़ने के बारे में बात करते हुए ज्योति कहती हैं कि किसी दर्दनाक अनुभव को भूल जाना ही सुलह नहीं है। वह कहती हैं, “मैं चाहती हूं कि लोग समझें कि सुलह का मतलब हमेशा यह नहीं होता कि जो हुआ उसे भूल जाएं या ऐसा दिखाएं कि कुछ हुआ ही नहीं। कई बार इसका मतलब सिर्फ इतना होता है कि हम उस गुस्से को हमेशा अपने साथ लेकर चलने के बजाय आगे बढ़ने का फैसला करें। आप अपने दर्द को स्वीकार कर सकते हैं, उससे सीख सकते हैं, अपनी सीमाएं तय कर सकते हैं और फिर भी शांति को चुन सकते हैं। मेरे हिसाब से यह खुद को संभालने और आगे बढ़ने का एक बहुत मजबूत तरीका है।”