कोविड-19 महामारी ने दुनिया भर के सिस्टम्स को झकझोर दिया, लेकिन सबसे गहरे घाव भारत के प्रवासी श्रमिकों की जिंदगी पर पड़े। शासन ठप हुआ, परिवहन बंद हुआ, रोजगार गायब हो गया फिर भी जीवन नहीं रुका। हजारों लोग पैदल ही घर लौटने की कोशिश में निकल पड़े, अनिश्चित भविष्य का डर, परिवार से मिलने की उम्मीद और भूख की पीड़ा उन्हें आगे बढ़ाती रही। इन लंबी यात्राओं में अनगिनत कहानियां जन्मीं कुछ उजागर हुईं, अधिकांश भुला दी गईं। लेकिन उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के दो दोस्तों की कहानी ने दुनिया को मानवता, मित्रता और कठोर सामाजिक यथार्थ का आईना दिखाया।
निर्देशक नीरज घोषवन ने इस कहानी को फिल्म “होमबाउंड” में ढाला। यह वास्तविक कहानी है मोहम्मद सैय्यब और अमृत प्रसाद की, जो देवरी गांव के रहने वाले थे और सूरत की एक टेक्सटाइल फैक्ट्री में मजदूरी करते थे। 24 मार्च 2020 को अचानक घोषित लॉकडाउन ने उनकी दुनिया पलट दी ना काम, ना आमदनी, ना रहने की जगह। हजारों अन्य प्रवासियों की तरह, ये दोनों दोस्त रातों-रात अकेले छोड़ दिए गए।
भूख और घर की याद जब साथ आती है, तो इंसान के पास लौटने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। सैय्यब और अमृत ने भी यही किया। लेकिन उनका सफर आसान नहीं था। सार्वजनिक परिवहन बंद, भोजन और पानी की कमी, पुलिस बैरिकेड, और महामारी का डर सब उनकी मित्रता और हिम्मत की परीक्षा बन गए।
छोटे थैलों के साथ तेज़ धूप में जलते सड़क पर चलना उनकी संघर्ष यात्रा का प्रतीक बन गया। कई किलोमीटर चलने के बाद उन्हें शिवपुरी के पास एक ट्रक मिली। अमृत को जल्द ही बुखार और खांसी होने लगी, जिसे उस समय मृत्यु का संकेत समझा जाता था। अन्य मजदूरों ने डरते हुए कहा कि उसे ट्रक से उतारना होगा। लेकिन सैय्यब ने उसे अकेला नहीं छोड़ा। “वह मेरा दोस्त है,” उन्होंने बस इतना कहा।
सैय्यब ने अमृत को ट्रक से उतार कर सड़क किनारे बैठाया, सिर अपने घुटनों पर रखते हुए पसीना पोंछा और उसे शांत करने की कोशिश की। किसी राहगीर ने यह क्षण कैमरे में कैद किया। यह एक तस्वीर बन गई, जिसने भारत में प्रवासियों की पीड़ा को वैश्विक ध्यान दिलाया। न्यूयॉर्क टाइम्स के पत्रकार बशारत पीर ने इसे “Take Amrit Home” शीर्षक से प्रकाशित किया।
स्थानीय स्वयंसेवकों की मदद से दोनों को झांसी अस्पताल ले जाया गया, लेकिन अमृत की स्थिति बहुत बिगड़ चुकी थी। घंटों बाद उनकी मृत्यु हो गई। यह सिर्फ एक मित्र की मौत नहीं थी, बल्कि उस युग में अनगिनत परिवारों के मौन दुःख का प्रतीक थी। सैय्यब ने अंतिम कर्तव्य निभाया और अमृत का शव गांव तक पहुँचाया। उनकी दोस्ती और मानवता की मिसाल पूरे देश में सराही गई।
सिनेमाई रूपांतरण
नीरज घोषवन, जिन्होंने “मसान” जैसी संवेदनशील फिल्मों में काम किया है, ने इस कहानी को बड़े पर्दे पर लाया। होमबाउंड में उन्होंने अतिशयोक्ति से बचते हुए यथार्थपूर्ण दृश्यों के माध्यम से दर्द, संघर्ष और आशा को पेश किया। धर्मा प्रोडक्शंस के बैनर तले ईशान खट्टर, विशाल जठवा और जाह्नवी कपूर ने भावनाओं और वास्तविकता का अद्भुत मिश्रण किया।
फिल्म केवल इस घटना तक सीमित नहीं है। इसके पात्र चंदन वाल्मीकि और शोएब मलिक केवल दो लोग नहीं हैं—they Dalit और मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधि हैं। आधुनिक भारत में जाति और धर्म अक्सर किसी की तक़दीर तय करते हैं। गरीब मजदूर वर्ग से जन्म लेने की स्थिति इन बाधाओं को और गहरा देती है।
चंदन और शोएब बचपन से ही घनिष्ठ मित्र रहे। उनका सपना सरल था पुलिस बनना। वे चाहते थे कि इस पेशे के माध्यम से वे सामाजिक अपमान और असमानता से मुक्ति पाएं। लेकिन सिस्टमिक बाधाओं ने उनके सपनों को बार-बार तोड़ा। गुजरात में मजदूरी करते हुए जैसे ही उनकी जिंदगी में स्थिरता आई, महामारी ने फिर सब कुछ तहस-नहस कर दिया। 1,200 किलोमीटर की पैदल यात्रा के दौरान चंदन शोएब की बाहों में ही दम तोड़ देते हैं।
फिल्म रोजमर्रा के भेदभाव को भी दिखाती है। जैसे, किसी कंपनी में भारत-पाकिस्तान मैच के दौरान शोएब को धर्म के आधार पर निशाना बनाया जाता है। यह माइक्रो-अग्रेशन, समाज के लिए सामान्य है, लेकिन झेलने वालों के लिए असहनीय है।
नीरज घोषवन ने फिल्म में न तो किसी को नायक बनाया है, न खलनायक। फिल्म पूरी सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक व्यवस्था की आलोचना करती है, जो जाति, धर्म और वर्ग के आधार पर जीवन तय करती है।
ऑस्कर की ओर
होमबाउंड अब भारत की आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में 2026 के ऑस्कर (98वें अकादमी अवार्ड्स) में शामिल है। यह न केवल फिल्म निर्माता और टीम के लिए गर्व का पल होगा, बल्कि पूरे भारतीय सिनेमा और देश के लिए भी गौरव का क्षण साबित होगा।